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राजनीतिक पूर्वाग्रह में पार्टियां

Posted On: 24 May, 2017 में

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आज के समय मे कोई भी पार्टी अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन सही तरीके से नही कर रही है,अपनी साख को बचाने के लिए पार्टी प्रमुख या पार्टी का कोई भी सदस्य, किसी भी हद तक जा सकती है, अगर कोई भी पार्टी या उसका सदस्य भ्रष्टाचार में घिर रहा है तो उसको खड़े होकर उस आरोप का उत्तर देना चाहिए न कि किसी भी पार्टी के कार्यालय या उसके सदस्यों से मारपीट किया जाय। ऐसा केस कुछ राज्यों में देखने को मिल रहा है, इनमें मुख्यतः पश्चिम बंगाल और बिहार मुख्य रूप से है , अब अगर कोई भी राजनीतिक दल किसी भी प्रकार का कोई अपराध करता है या फिर करवाता है तो उसके खिलाफ जांच का मामला तो बनता ही है, क्योकि ये लोग उसी पार्टी से जुड़े हुए होते है जिसने अपराध किया है।अब अगर इनकी जांच न की गई तो फिर अपराध बढ़ता ही जायेगा और विश्व में भारत का भ्रष्टाचार का ग्राफ जब बनेगा तो कोई संदेह नही रहेगा कि भारत भ्रष्टाचार में सबसे आगे न हो, इसलिए देश मे कोई भी घोटाला अगर होता है तो उसकी जांच की प्रक्रिया जरूर पूरी होनी चाहिये, आज जिस प्रकार से लालू यादव एंड सन्स के विभिन्न प्रॉपर्टीयों पर सीबीआई ने छापे मारे, और इस बात की सच्चाई का पता लगाना चाहा कि दोषी कौन है , लेकिन दुर्भाग्य कि सच्चाई का पता तो लग नही पाया, परन्तु लालू यादव के समर्थकों ने जिस प्रकार से भाजपा के ऑफिस पर हमला किया, और वहाँ पर मारपीट की , यह सरासर गलत है क्योंकि जांच एजेंसियों का काम है जांच करना , फिर गुस्सा भाजपा के आफिस पर क्यो? यही काम टीएमसी के लोग बंगाल में भी करते है जब उनका इसलिए अगर कोई राजनीतिक दल गलत करता है और उसके खिलाफ भ्रष्टाचार की आवाज़ बुलंद होती है तो उसको दृढ़ता से जांच करवानी चाहिए और अपने बेगुनाही का सबूत देना चाहिये, न कि तोड़-फोड़ करके गुंडागर्दी का सबूत देना चाहिये, किसी भी आरोप का जबाब धैर्य और शालीनता से देना चाहिये, लेकिन अफसोस कि आरोपित पार्टी के नेता अपने आरोप का जबाब न देकर वह पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर दूसरे पर लांछन लगा देते है, न कि अपने दाग को धुलने में बुद्धि का परिचय दें।जिससे कि उनके ऊपर लगे लांछन को हटाया जा सके। *****************************************नीरज कुमार पाठक नोयडा

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