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राजनीतिक पार्टियों की चंदे से कटती चांदी

Posted On: 10 Jan, 2017 में

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राजनीति का क्षेत्र एक ऐसा पानी का भँवर है जिसमें कुछ भी हो ,कैसा भी हो सब को अपने अंदर समाहित कर लेता है। चाहे पानी स्वच्छ हो, मटमैला हो ,गन्दा हो,सभी प्रकार का पानी उस भँवर में घुलमिल जाता है और फिर एक ही रंग बना लेता है फिर इसमें ये पता लगाना मुश्किल ही नही नामुकिन हो जाता है कि कौन-सा पानी किस तरह का था। ठीक इसी प्रकार राजनीतिक भँवर में भी कई तरह से पैसे आने के श्रोत होते है और ये पैसे आये कही से लेकिन जाने का एक ही श्रोत होता है और उस श्रोत के जरिये पूरा चंदे का पैसा हजम हो जाता है चूँकि ये पैसा राजनीतिक पार्टियों का होता है इसलिए इसको कालेधन की श्रेणी में भी नहीं लाया जा सकता है और इस प्रकार से राजनीतिक पार्टियों का चंदे से चांदी कटती है। ये ऐसा श्रोत है कि इसके बारे में कोई पता भी नही लगा सकता है किस पार्टी के पास कितना पैसा है,कितना सही है कितना गलत है। इन सब का आकलन करना बहुत ही कठिन काम है,आकलन कोई कर भी नही सकता, क्योंकि हर पार्टी में पैसा अवैध रूप से ही आता है यह सभी दलों के लोगों को भी पता है और देश के लोगों को भी पता है। इन पैसों का कोई भी हिसाब नही है और न ही देना पड़ता है। भले ही चुनाव आयोग का कड़ा पहरा हो फिर भी दलों के खर्चे पर किसी का कोई हथकंडा काम नही करता। राजनीतिक दलों के हलफनामे भी हाथी के दांत साबित होते है।कहने को तो राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग को सब ब्यौरा दे देती है लेकिन क्या उस हलफनामे में जितना जानकारी होती है उसको पूर्णतया सत्य कह सकते है।ऐसा नही है कि उसको हम पूरी जानकारी कह सकते है कुछ जानकारियां फिर भी राजनेता छुपा ही लेते है। *****************************************नीरज कुमार पाठक नोएडा

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