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मिड-डे मील, मौत या जिंदगी

Posted On: 15 May, 2016 में

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हर सरकार का प्रयास होता है कि अपने जनता के लिये कुछ न कुछ जनहित मे कार्य करे। इसी उद्देश्य को लेकर सरकार ने एक योजना मिड -डे मील के रूप मे शुरु की जो बिद्यालयो मे लागू हुई, लेकिन यह योजना सच पूछा जाय तो सफल नही हुई क्योकि ये योजना भी हमारे भ्रष्टतंत्र की भेंट चढ़ गया । ये योजना हमारे भावी कर्णधारो के लिये थी,कि स्कूल मे पढ़ने के लिये जो नौनिहाल आये,उनको पौष्टिक आहार की ब्यवस्था हो सके । लेकिन लापरवाही के कारण कितने मासूम जिंदगी को कुर्बानी देनी पड़ीं। इस योजना की भेंट न जाने कितने बच्चों को अपनी जान देकर करना पड़ा। अब सरकार की योजना को दोष दे या अपने तंत्र की कमजोर कड़ी का ,जो बच्चों को बढ़ने नही दे रहे है। एक परिवार के खिलते फूल को मुरझाने के लिये बेबस कर देते है। इस फूल के माली भी वेचारा करे भी तो क्या करे ,उसने जो मजबूरी की चद्दर ओढ़ रक्खी है।उसके पास इतने पैसे भी नही होते कि वह अपने फूल को प्राइवेट बगीचे मे खिलने के लिये भेजे। इसलिए अपने नन्हे से फूल को खिलने के लिये वह सरकारी तंत्र के बगीचे मे ही सवारने की कोशिश करता है लेकिन उसको क्या पता कि यहाँ कि जिस बगीचे मे मैं अपने नन्हे से फूल को भेज रहा हू,वहाँ से ये खिलने के बजाय मुरझा के निकलेंगे,लेकिन ये कोई जरूरी नही है कि सभी फूल मुरझा के निकले।इसमे भी अपनी -अपनी किस्मत होती है। प्रशासन की क्या ब्यवस्था होती है ये समझने वाली बात है,क्योंकि मिड-डे से बच्चों को नुकसान ज्यादा हुआ ,फायदा कम हुआ। इस योजना मे सबसे बड़ी बात यह है कि इसमे भष्टाचार चरम सीमा पर रहता है। खाद्यान्न की गुणवत्ता ,पके खाने की गुणवत्ता ये सब इतनी घटिया स्तर की होती है कि बच्चे भी क्या करे ,वह खाना खाने के लिए मजबूर है।खाना खाते है बीमार पड़ते है और उसके बाद किस्मत खराब रही तो मौत की भेंट चढ़ जाते है। अभी हाल ही मे मथुरा मे दूध पीने से कितने बच्चो की मौत हो गयी। अब उन बच्चों को क्या पता की मैं विषपान कर रहा हू।ये गलती किसकी है,बच्चों की या फिर हमारे शासन ब्यवस्था की। बच्चों की गलती यही हो सकती है कि उन्होंने दूध पीने की जुर्रत की।सबसे महत्तवपूर्ण बात ये है घटना कितनी बड़ी क्यो न हो गलती कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नही होता। मिड-डे मील योजना मे आये दिन जो खाना बनते है उसमे भी कही न कही कोई खामियां मिल जाती है। खाने मे कही छिपकली मिलेगी या फिर चूहे मिलेगे ।तो इतनी भारी लापरवाही कहां से होती है इसका जबाब कोई देने वाला नही है।अब सवाल ये उठता है कि उस योजना को क्यो चलाया जाता है,जिस योजना से हमारे बच्चों को अपनी जिंदगी गवानी पड़ती है। ———————————————————————-नीरज कुमार पाठक आई.सी.ए.आई.भवन सी-1 सेक्टर-1 नोयडा 201301

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